कबीर इस बारहवीं रमैनी में माया -मोह, मन का राग रंग सबको त्यागने की बात प्रतीकात्मक ढ़ंग से कहते हैं। देखिये कुछ बानगियाँ : माटी के कोट पसान को ताला, सोइ एक बन सोइ रखवाला। शब्दार्थ :पसान (पाषाण ),कोट (किला ) कबीर कहते हैं यह शरीर तो वैसे ही जड़ है जड़ तत्वों का जमा जोड़ है हवा पानी मिट्टी, आकाश और आग का ही तो इकठ्ठ है।इस पर जड़ पाषाण का ताला मत जड़। अपनी विवेक बुद्धि को पहचान अन्वेषण कर हित , अहित का। यह जड़ बुद्धि ही माया है। इस अविद्या ,माया के राग रंग रूप से तू मुक्त हो। सो बन देखत जीव डिराना, ब्राह्मण वैष्णव एक ही जाना। बन (माया का जंगल ),ब्रह्मण - वैष्णव(कर्म कांड के धंधे बाज़ ) यह माया का जंगल माया का कुनबा तूने ही रचा है। यह तो जाना ही जाना है यह शरीर भी जाना ही जाना है बुढ़ापे से रोग से छीजना ही छीजना है। इससे क्यों भयभीत होता है यह तेरा निज स्वरूप नहीं है तेरा निज स्वरूप न कहीं जाता है न कहीं से आता है तेरे ही साथ रहता है। लेकिन उस पर माया रुपी जंगल हावी ...